My 11 Ounces

Wednesday, November 25, 2009

कल हमने
एक रात बिताई रे ,
संग अपने थे,
साथी, सर्दी, चाँद रजाई रे.
मुई गर्मी भी ठिठुर गई
कोहरे ने कर दी
धरती की यूँ गोद भराई रे.
पत्ता भी कहीं कोई
एक हिले तो लगे
छुरी तेज़ कसाई रे.

Saturday, November 14, 2009

अकेलेपन का अहसास
कब होता है?

दोस्तों के जाने के बाद
कुर्सियों को पुरानी जगह लगा दो,
तब होता है!

ज़्यादा जली सफ़ेद-पीली
बत्तियों को वापस बुझा दो,
तब होता है!

उनके छोडे आधे बचे
जामों को पानी के नीचे लगा दो,
तब होता है!

Thursday, October 22, 2009

आद्या के लिए

देख ले ज़िन्दगी
तेरे पालने में
रखी है एक नई ज़िन्दगी,
कसी हुई दो हथेलियाँ,
बंद जिनमें तेरे लिये मासूम पहेलियाँ.
अभी ज्यादा तुझसे खुली नहीं हैं,
नाक गली की वो चंचल दो सहेलियां.
नन्हे नन्हे पैर वो
ऐसे उठते और दुबकते हैं,
बाग़ में ओट लगाता
मानो कोई बहेलिया...

Sunday, September 27, 2009

नींद का अब हर रात इस दर पे आना बंद हुआ
रहती थी जिस गली वो हमारा जाना बंद हुआ ।

बैठ लेते थे जहाँ फुरसत से शाम को अक्सर,
इस घर से पहले रस्ते का वो मयखाना बंद हुआ।

सबसे ज़्यादा सजाती थी नज़र का टीका पाते थे,
माँ भी तबसे उखड़ गई जबसे तुतलाना बंद हुआ.

मेरा घर महफूज़ रहेगा इसकी क्या तसल्ली होती,
मस्ज़िद जिस दिन तेरी टूटी सर का झुकना बंद हुआ।

बचपन सी छोटी डांट के डर से शाम-अंधेरे घर जाते थे,
आज बड़े-बड़े झूठ से वो थोड़ा भी घबराना बंद हुआ।

Friday, September 25, 2009

देखें तो हर झूठ में कुछ सच नज़र आता है,
उठें जो हाथ दुआ में उनमें खुदा नज़र आता है।

हकीक़त में भले न मंजिल-ऐ-मंसूब हो,
ख़्वाबों में तो पूरा हुआ नज़र नज़र आता है।

दिनभर जितना देखो-सुनो जिस चेहरे को,
रात जब लिखने बैठो तो जुदा नज़र आता है.

Friday, September 18, 2009

कुम्भ के साधू सा थके हैं दिनभर, अब घर जायेंगे
महफिलें सजाएं दुनियावाले, वहां हम कहाँ जायेंगे!

सूरज की आड़ में छिपी थी रौशनी परछाईं बनके
टिमटिमाती लौ लेकर चाँद के सामने कहाँ जायेंगे

जिस दरख्त को लग जाए हवस दावानल की
उसके लिए लोग कुल्हाड़ी लेकर कहाँ जायेंगे.

Monday, September 14, 2009

वो बात

अब पड़ोस में वो बात नहीं है
कटोरियों में आती-जाती वो सौगात नहीं है
नहीं पड़ते कानों में वो बेसुरे भजन
अल्लाह-ओ-अकबर की वो आलाप नहीं है।

शहर की इस भीड़ में ली है पनाह हमने
रहते हैं जहाँ ज़मीन से बहुत ऊपर
पर फिर भी
आसमान छूने की औकात नहीं है।

शक्लें और हाथ
रोजाना मिलते हैं बेहिसाब
पतंग के मांजे से कटे वो हाथ नहीं हैं

दावतें वो महफिलें अब भी होती हैं
गली-नुक्कड़ पे सजी
शतरंज की वो बिसात नहीं है
मेरे पड़ोस में अब वो बात नहीं है!